गुरुवार, 22 मई 2014

सम्‍बंधों का सेतु !

 सम्‍बंधों का सेतु
अपनी अडिगता पर
कई बार होता है अचंभित
जब वो कई बार चाहकर भी
अपने दायित्‍वों से
विमुख नहीं हो पाता
हर परीस्थिति में
टटोलता है खुद को
करता है अनगितन प्रश्‍न
अपने ही आप से
सम्‍बंधों का सेतु !
....
उसके स्‍तंभों में
विश्‍वास का सीमेंट
भरा गया था कूट-कूटकर
उसने सीख लिया था
अडिगता का पाठ
कल-कल करती नदिया के बीच
जो कहती जाती थी
उससे दूर जाते हुए हर बार
तुम्‍हें परखा जाएगा
पर तुम्‍हें रहना होगा अडिग
मेरी नियति बहना है जैसे वैसे ही तुम्‍हें
बस हर हाल में अडिग रहना है !!!  

.....

19 टिप्‍पणियां:

  1. संवेदनशील ....बहुत सुंदर अभिव्यक्ति सदा जी ...!!

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  2. सम्बन्ध और वादे निभाने के लिए ही बने होते हैं...

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  3. पर जितना लचीला उतना मज़बूत…

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  4. बहुत सुन्दर बात..............
    बहती नदी के किनारों को जोड़े रहता है अडिग सेतू.................

    सस्नेह
    अनु

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  5. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस' प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (24-05-2014) को "सुरभित सुमन खिलाते हैं" (चर्चा मंच-1622) पर भी होगी!
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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  6. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन डबल ट्रबल - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  7. आशा का आह्वान है ... अडिग रहने की प्रेरणा ...
    बहुत खूब ..

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  8. सबकी अपनी अपनी नियति :)
    सुंदर !!

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  9. बहुत सुंदर। संबंध बनाये रखता है ये अडिग सेतु।

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  10. कदम मज़बूत होने चाहिए ! मंगलकामनाएं !!

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  11. सुंदर संदेश देती कविता..

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  12. एक सकारात्मक अभिव्यक्ति ...... बहुत खूब !

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  13. उसने सीख लिया था
    अडिगता का पाठ......
    सकारात्मक कविता..

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  14. काफी दिनों बाद आना हुआ इसके लिए माफ़ी चाहूँगा । बहुत बढ़िया लगी पोस्ट |

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  15. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति सदा जी ...!!

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  16. संबंधों के सेतु के स्तंभों में विश्वास का सीमेंट ही होना चाहिए । सुन्दर अभिव्यक्ति

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  17. अब शायद कमजोर हो चला है यह सम्बन्धों का सेतु क्यूंकि विश्वास के सीमेंट में भी अब मिलावट होने लगी है। बेहतरीन भावाभिव्यक्ति....

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मन को छू लें वो शब्‍द अच्‍छे लगते हैं, उन शब्‍दों के भाव जोड़ देते हैं अंजान होने के बाद भी एक दूसरे को सदा के लिए .....