ना बातें मुकद्दर की किया कर,
जो भी है तू हंस के जिया कर ।
जीने के हैं चार दिन इसी बात
पर ही अमल कर लिया कर ।
तेरे-मेरे की रूसवाईयों को छोड़,
सच्चाई से रूबरू हो लिया कर ।
झुका के सजदे में सर रब के,
आगे कानों को छू लिया कर ।
करनी कर के पछतावे जो कोई
तू ऐसे जुर्म से बच लिया कर ।
ये बातें गजल तो ना हुईं सदा तू
सीधी सच्ची बात समझ लिया कर ।
