रविवार, 31 मई 2015

इन जिदों की मनमानी!!!!


कुछ जि़दों में से
एक को आज मैने
बाँध दिया है
ओखल डोरी से
और बंद कर दिया है
मन के अँधेरे कमरे में
सोचा है अब
नहीं जाऊँगी पास इनके.
....
इन जिदों की मनमानी
अपनी हर बात को पूरा करवाना
बहुत हुआ
कुछ समय पश्‍चात्
उस अँधेरे कमरे से आवाज आती है
मेरा कुसूर तो बताओ
मैं हथेलियाँ रखती कानों पे
पर क्‍या होता
आवाज़ तो मन के भीतर से थी
कुछ ताक़तें
न हीं क़ैद होती है न भयभीत
उन्‍हें लाख अँधेरे कमरे में रख लो
वो हौसले की मशाल बनकर उभरती हैं
जि़द भी एक ऐसी ताक़त है
जो ठान लेती है एक बार
उसे पूरा करके ही दम़ लेती है
फिर उसकी शक्‍़ल में
चाहे मुहब्‍बत हो या नफ़रत
....


16 टिप्‍पणियां:

  1. बिलकुल … ये सकारात्मक दिशा हो तो सबका भला, वरना

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  2. सकारारात्मक जिद को प्रोत्साहन देना चाहिए

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  3. कुछ ताकतें न कैद होती हैं न भयभीत!
    मन की जिद भी ऐसी.
    कुछ जिद भली हों तो सुनना ही पड़ता है!
    अच्छी रचना!

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  4. जिद तो होनी ही चाहिए। उम्दा रचना

    http://chlachitra.blogspot.in/
    http://cricketluverr.blogspot.in/

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  5. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (01-06-2015) को "तंबाखू, दिवस नहीं द्दृढ संकल्प की जरुरत है" {चर्चा अंक- 1993} पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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  6. मन की शक्ति अपार है...इससे अपने बलबूते पर पार पाना बहुत कठिन है..

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  7. बहुत सुन्दर अंदाज जिद पर कहने का |

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  8. लो आपकी की इस जिद में शामिल होने हम भी आ गये

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  9. जिद को बांधने की भी एक जिद ही पूरी कर रही हैं आप :)

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  10. सुन्दर व सार्थक रचना प्रस्तुतिकरण के लिए आभार..
    मेरे ब्लॉग की नई पोस्ट पर आपका इंतजार...

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मन को छू लें वो शब्‍द अच्‍छे लगते हैं, उन शब्‍दों के भाव जोड़ देते हैं अंजान होने के बाद भी एक दूसरे को सदा के लिए .....