गुरुवार, 30 अप्रैल 2015

मंजिलों के रास्‍ते!!!

कर्तव्य की कोई भी राह लो
उस पर चलते जाने की शपथ
तुम्‍हें स्‍वयं लेनी होगी
राहें सुनसान भी होंगी
कोशिशें नाक़ाम भी होंगी
पर मंजिलें कई बार
करती हैं प्रतीक्षा
ऐसे राही की
जो सिर्फ उस तक
पहुँचने के लिए
घर से चला था.
.....
मंजिलों तक जाने के लिए
हमेशा अकेले ही
तय करने होते हैं रास्‍तें
अकेले ही चलना होता है
और पूछना होता है
पता भी मुश्किलों से
मुझे कितनी दूर 
यूँ ही तुम्‍हारे साथ
तय करने हैं
मंजिलों के रास्‍ते!!!

....

8 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर..मुश्किलें ही मंज़िल का सही पता बताती हैं...

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  2. राहों पे छोड़ कदमों के निशां
    मंजिल तुझे ख़ुद ढूंड लेगी ........शुभकामनायें |

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  3. मंजिल, रस्ता और राही,..तीनों एक दूसरे पर आश्रित हैं..,आशा और विश्वास से भरी पंक्तियाँ..

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  4. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (01.05.2015) को (चर्चा अंक-1962)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।

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  5. कोई न हो! मुश्किलें हमराह होती हैं!
    अच्छी रचना!

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  6. मुश्किलें इतनी भी मुश्किल नहीं......सब सोच की बात है...

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  7. मुश्किलों में ही आगे बढ़ने का फलसफा भी छुपा है. बहुत सुंदर भावपूर्ण रचना.

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  8. प्रेरक .... मुश्किलों से ही पता करना होता है मंजिल का रास्ता ... बहुत खूब .

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मन को छू लें वो शब्‍द अच्‍छे लगते हैं, उन शब्‍दों के भाव जोड़ देते हैं अंजान होने के बाद भी एक दूसरे को सदा के लिए .....