गुरुवार, 12 फ़रवरी 2015

आईना मन का !!!!


आईना मन का
संवारे घड़ी-घड़ी रूप अपना
करे श्रृंगार जब प्रेम का
तो खुद ही ये इतराये
उदासी की सूरत में
पलकें भी न झपकाये
कोई इसको
कितना भी समझाये!
....
पगला है मन कहते हैं सब
पल में खुश पल में नाखुश
इसकी खुशियों का हिसाब
रखते हुए जिंदगी
कई बार चूक कर जाती है
रिश्‍तों के गणित में
शून्‍य आता है जब परिणाम
तो नये सिरे से करती है
ज़मा और घटे का हिसाब
पर कहाँ मिलता है सू्त्र
जो मन को हमेशा
सौ में सौ दे सके!!
...
मन राजा हो तो
कुछ न होकर भी
बहुत कुछ होता है पास
संतोष का धन
हमेशा खजाने में
होना ज़रूरी है
फिर ये अमीरी 
ताजिंदगी साथ रहती है !!!!

16 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (13.02.2015) को "भावना और कर्तव्य " (चर्चा अंक-1888)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।

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  2. बिलकुल , ये अमीरी साथ नहीं छोड़ती

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  3. शुभ संंध्या दीदी
    काफी दिनों के बाद नेट पर आई हूँ
    आते ही आपके दर्शन हो गए...अहोभाग्य
    बहुत सुन्दर रचना पढ़वाई आपने
    आभार...

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  4. मन राजा हो तो कुछ न होकर भी बहुत कुछ होता है पास संतोष का धन हमेशा खजाने में होना ज़रूरी है फिर ये अमीरी ताजिंदगी साथ रहती है !!!!

    सुंदर पंक्तियां।

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  5. सच में सुख दुःख सब मन के ऊपर ही निर्भर है...बहुत सुन्दर प्रस्तुति...

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...

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  7. सुन्दर सार्थक प्रस्तुति...

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  8. संतोष की अमीरी ताजिंदगी साथ रहती है..बहुत सही...
    नमस्कार..

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  9. संतोष ही तो सब है ..अति सुन्दर कहा है .. आभार..

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  10. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  11. बहुत खूब, मंगलकामनाएं आपको !

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  12. सुन्दर शब्द रचना --- मन से मन तक भाती हुई
    http://savanxxx.blogspot.in

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मन को छू लें वो शब्‍द अच्‍छे लगते हैं, उन शब्‍दों के भाव जोड़ देते हैं अंजान होने के बाद भी एक दूसरे को सदा के लिए .....