रविवार, 18 जनवरी 2015

कैसा ये रिश्‍ता है ....

विश्‍वास की मुट्ठी में
डर की उँगली
एक मुस्‍कान हौसले की लबों पर
सोचती हूँ
कैसा ये रिश्‍ता है
हार और जीत के पलों में
हौसले का
जो हर बार उम्‍मीद लिये
आँखों में पलता है
निराशा के रास्‍तों पर
बड़े ही जोश से
साथ-साथ चलता है!!!!

....

13 टिप्‍पणियां:

  1. ये जज़्बा है ...जो हौंसला बनाये रखता है .....

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  2. अशोक जी की बात से पूर्णतः सहमत...बहुत उम्दा!!

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  3. सार्थक प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (19-01-2015) को ""आसमान में यदि घर होता..." (चर्चा - 1863) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  4. गंभीर सोच के साथ सधी हुई दिल की बाते

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  5. हौसले से ही उड़ान होती है...

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  6. जीवन विरोधाभास से भरा है ,इसमें हिम्मत और हौसला ही काम आता है |
    तमन्ना इंसान की ......

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  7. यही भरोसा जीने का सम्बल देता है। उम्दा।

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  8. ये होंसला ही जीवन को प्रेरित करता है ... इसका साथ जरूरी है हर इंसान को ...

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  9. यही रिश्ता तो जीवन का संबल है...बहुत सुन्दर प्रस्तुति

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  10. निराशा का रास्ता नाप लिया जाता है जब साथ विश्वास का हौसला हो । प्रेरक सोच ।

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  11. बहुत दिनों बाद अपने सधे हुये अन्दाज़ में एक दार्शनिक सोच!!

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मन को छू लें वो शब्‍द अच्‍छे लगते हैं, उन शब्‍दों के भाव जोड़ देते हैं अंजान होने के बाद भी एक दूसरे को सदा के लिए .....