गुरुवार, 8 जुलाई 2010

हंसने के फन में ....






तेरी मुहब्‍बत मुझे इस कदर रूलाएगी छिपाने में,

उसको इक मुस्‍करा‍हट भी मेरी न काम आएगी ।

यूं तो हंसने के फन में खूब माहिर हूं होगा क्‍या,

जब हंसी बन के अश्‍क आंखों से छलक जाएगी ।

दर्द तेरा दिया अब दवा का काम करता है,

जख्‍म पे कोई मरहम अब न काम आएगी ।

टीस जख्‍मों की चैन दिल का बन गया मेरे,

इस चुभन से बच के जिन्‍दगी किधर जाएगी ।

जुर्म हो गया मुहब्‍बत पे इस तरह ऐतबार करना,

इसकी कीमत तो ताउम्र अश्‍को से चुकाई जाएगी ।

18 टिप्‍पणियां:

  1. जब उनका दर्द दावा बन जाए तो मरहम का क्या काम .....
    बहुत अच्छे जज्बातों से पिरोया है रचना को .....

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  2. जुर्म हो गया मुहब्बत पर यकीन करना की ताउम्र आंसुओं में नहायेंगे ...

    हम भी डूब रहे हैं आपके साथ इस दर्द में ...यही तो रचना की सार्थकता हुई ना ...!

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  3. जुर्म हो गया मुहब्‍बत पे इस तरह ऐतबार करना,

    इसकी कीमत तो ताउम्र अश्‍को से चुकाई जाएगी ।
    "Har hansee kee qeemat
    ashkon se chuayi hamne
    Pata nahi aur kitna qarz,
    raha hai baaqee,
    aansoo hain,ke,thamte nahin.."

    उत्तर देंहटाएं
  4. जुर्म हो गया मुहब्‍बत पे इस तरह ऐतबार करना,

    इसकी कीमत तो ताउम्र अश्‍को से चुकाई जाएगी ।
    --

    बहुत सुन्दर रचना!

    उत्तर देंहटाएं
  5. यूँ तो हंसने के फन मे खूब माहिर हैं---- क्या सच फिर दुख किस बात का? लेकिन रचना बहुत अच्छी लगी। शुभकामनायें

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  6. मंगलवार 13 जुलाई को आपकी रचना ... चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर ली गयी है आभार

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  7. जुर्म हो गया मुहब्‍बत पे इस तरह ऐतबार करना,
    इसकी कीमत तो ताउम्र अश्‍को से चुकाई जाएगी ।

    behad khubsurat..

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  8. अच्छी लगी लाजवाब!!!!!! किस किस बात कि दाद दूँ हर बात दूसरे से भी बढ़ कर

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  9. सदा जी आपके दूसरे ब्लाग सदा सृजन पर कमेन्ट नही पोस्ट हो रहा। देखें। धन्यवाद।

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  10. बहुत सुन्दर ग़ज़ल बधाई। "ज़ख़्म पे अब कोई न मरहम काम आयेगी"
    इस पक्ति में मुझे व्याकरण दोष ( जेन्डर का ) लग रहा है देख लीजियेगा।

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मन को छू लें वो शब्‍द अच्‍छे लगते हैं, उन शब्‍दों के भाव जोड़ देते हैं अंजान होने के बाद भी एक दूसरे को सदा के लिए .....