
काम मेरा यहां क्या है सत्य एक दिन,
झूठ की बात सुन-सुन कर घबराया था ।
हर शख्स को किसी न किसी से झूठ,
बोलते जब से अपनी नजरों से पाया था।
हिंसा बढ़ गई, अत्याचार, अनाचार के,
साथ अहिंसा को जब से घिरा पाया था।
मतलब से मिलते लोग एक दूसरे से,
अपनों से ज्यादा परायों को पाया था।
रक्षक बन बैठे भक्षक जब से यहां पर,
कातिल खुद को अपना समझ पाया था ।




