रविवार, 13 जनवरी 2019

बचत का सलीका !!

माँ तुम जौहरी तो नहीं थी
न ही कोई व्यापारी
पर परखने का तरीक़ा
बचत का सलीका
कब कहाँ कैसे
खर्च करना है शब्दों को
कहाँ किसी टूटे औऱ
कमज़ोर का सहारा बनकर
उसे ताकतवर बना देना है
ये हुनर बखूबी सिखाया है
तुमने हमें !

5 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर श्रद्धांजलि माँ के नाम

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  2. सच लिखा है ...
    अनजाने ही कितना कुछ सिखा देती है माँ ...
    माँ जो है ...

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  3. यहाँ दोबारा पढ़ रही हूँ. बेहतरीन कृति है आपकी. एक बेटी अंततः माँ-सी हो जाती है माँ से सब सीखकर. माँ को नमन.

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  4. अनुपम रचना... बहुत कुछ सिखा देती है माँ..

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मन को छू लें वो शब्‍द अच्‍छे लगते हैं, उन शब्‍दों के भाव जोड़ देते हैं अंजान होने के बाद भी एक दूसरे को सदा के लिए .....