शुक्रवार, 8 जून 2018

घर की दहलीज़ !!!!

घर की दहलीज़ ने
आना-जाना और निभाना देखा
बन्द किवाड़ों ने सिर्फ़
अपना वजूद जाना
ये भूलकर की उन्हें थामकर
रखने वाली दहलीज़ 
कोई साँकल नहीं जो हर बार
बजकर या कुंदे पे चढ़कर
अपने होने का अहसास कराती
वो तो बस मौन ही
अपना होने का फ़र्ज निभाती है !!
...
खुशियों में रौनक बन जाती 
त्योहारों पे दीप सजा
जगमग हो जाती 
बने रंगोली जब भी
ये फूली न समाती
रंग उत्सव के पूछो इससे
हर क्षण बस मंगल गाती !!!!

13 टिप्‍पणियां:

  1. वाह ! दहलीज की मौन सुन्दरता को बखूबी बयाँ किया है आपने..

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (10-06-2018) को "गढ़ता रोज कुम्हार" (चर्चा अंक-2997) (चर्चा अंक-2969) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. बन्द किवाड़ों ने सिर्फ़ अपना वजूद जाना...कितनी खूबसूरत रचना

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  4. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, ८ जून को मनाया गया समुद्र दिवस “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  5. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना हमारे सोमवारीय विशेषांक ११ जून २०१८ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

    उत्तर देंहटाएं
  6. वाह!!सीमा जी ,बहुत खूब !

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  7. घर की दहलीज कितना कुछ संजो के रखती है अपने मन में और चारदीवारी के भीतर ... मन को छूने वाली रचना है ...

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  8. मौन रह कर भी घर की दहलीज़ ही है जो घर को सुरक्षित भी रखती ही . सुंदर रचना .

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  9. मौन सहादत देती है ठौकरों मे रहती है विरूदावली, पतन सब की साक्षी अचल अडिग देहरी होती है।
    अनुपम कृति।

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  10. प्रिय सीमा जी दहलीज का मानवीकरण कर उसके आंतरिक भावों को समेटती रचना बहुत खूब है | बहुत अच्छा लिखा आपने | हार्दिक शुभकामनाएं |

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  11. वो तो बस मौन ही
    अपना होने का फ़र्ज निभाती है !!
    सटीक वर्णन ।सुंदर रचना के लिए आपको बधाई ।
    सादर ।

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  12. बहुत बहुत आभार आप सभी का .... सादर

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मन को छू लें वो शब्‍द अच्‍छे लगते हैं, उन शब्‍दों के भाव जोड़ देते हैं अंजान होने के बाद भी एक दूसरे को सदा के लिए .....