मंगलवार, 9 जुलाई 2013

निकलना होगा विजेता बनकर !!!!

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
मुश्किल भरे रास्‍तों से गुज़र कर
दिल और दिमाग के कुछ हिस्‍सों में
गज़ब की ताकत आ जाती है
जंग लगे ख्‍याल भी
बड़ी ही फुर्ती से
अपना नुकीला पन दर्शा देते हैं
चोट खाया हिस्‍सा
जख्‍मों के निशान पर
एक पपड़ी मोटी सी धैर्य की डाल
बेपरवाह हो जाता है !!
...
मनमाने सुखों के लक्षागृह
किसके हुए हैं
निकलना होगा विजेता बनकर
तब ही तो धुन के पक्‍के लोग
इस मजबूती में ही जीते हैं
वर्ना उनके पास जीने की कोई वजह
शेष रहती ही नहीं है
माँ कहती है कुछ बातें वक्‍़त पर छोड़ दो
तो मन को बड़ा सुकून मिलता है
ये सच है कि कर्तव्‍य की सीढि़याँ
बड़ी ही ऊँची और घुमावदार होती हैं
चढ़ते चलो तो मंजिल मिल ही जाती है !!
 

36 टिप्‍पणियां:

  1. wah ! bahut khoob...zindagi jeenay ki seekh deti sundar rachna

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  2. उत्साहवर्धन करती अच्छी रचना ..

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  3. ये हुआ न जज़्बा...............
    सुबह सुबह इस कविता को पढ़ा...दिन अच्छा बीतेगा.

    सस्नेह
    अनु

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  4. बहुत सुंदर...... और मीनिंगफुल पंक्तिया .....

    उत्तर देंहटाएं
  5. सुन्दर प्रस्तुति-
    आभार आदरणीया-

    उत्तर देंहटाएं
  6. बेहद सुन्दर प्रस्तुतीकरण ....!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल बुधवार (10-07-2013) के .. !! निकलना होगा विजेता बनकर ......रिश्तो के मकडजाल से ....!१३०२ ,बुधवारीय चर्चा मंच अंक-१३०२ पर भी होगी!
    सादर...!
    शशि पुरवार

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  7. आपकी रचना कल बुधवार [10-07-2013] को
    ब्लॉग प्रसारण पर
    कृपया पधार कर अनुग्रहित करें |
    सादर
    सरिता भाटिया

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  8. सही कहा मुश्किलें अक्सर हमे और मजबूत बना देती हैं ।

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  9. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    साझा करने के लिए आभार!

    उत्तर देंहटाएं
  10. वाकई कर्तव्य की सीढियां बडी दुरूह ही होती हैं पर हौंसला बनाए रखना जरूरी है, बहुत ही सार्थक रचना.

    रामराम.

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  11. ये सच है कि कर्तव्‍य की सीढि़याँ
    बड़ी ही ऊँची और घुमावदार होती हैं
    चढ़ते चलो तो मंजिल मिल ही जाती है !!

    सटीक बात .... जिनके पास हौसला होता है उन्हें मंज़िल मिल ही जाती है ...

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  12. ये सच है कि कर्तव्‍य की सीढि़याँ
    बड़ी ही ऊँची और घुमावदार होती हैं
    चढ़ते चलो तो मंजिल मिल ही जाती है !!

    sarthak sundar abhivyakti ....

    उत्तर देंहटाएं
  13. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन फिर भी दिल है हिंदुस्तानी - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  14. आपने लिखा....
    हमने पढ़ा....
    और लोग भी पढ़ें;
    इसलिए आज प्रकाशन के बाद भी..... बुधवार 10/07/2013 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in
    पर लिंक की गई है.
    आप भी देख लीजिएगा एक नज़र ....
    लिंक में आपका स्वागत है .
    धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं
  15. मनमाने सुखों के लक्षागृह
    किसके हुए हैं
    निकलना होगा विजेता बनकर
    तब ही तो धुन के पक्‍के लोग
    इस मजबूती में ही जीते हैं

    बहुत सुन्दर बात

    उत्तर देंहटाएं
  16. मन में प्रेरणा जगाती सुन्दर रचना..

    उत्तर देंहटाएं
  17. ये सच है कि कर्तव्‍य की सीढि़याँ
    बड़ी ही ऊँची और घुमावदार होती हैं
    चढ़ते चलो तो मंजिल मिल ही जाती है !!

    ...बहुत सार्थक और प्रेरक रचना...

    उत्तर देंहटाएं
  18. मनमाने सुखों के लक्षागृह
    किसके हुए हैं
    निकलना होगा विजेता बनकर,सकारात्मक भावों को दर्शाती ,प्रेरित करती रचना ...

    उत्तर देंहटाएं
  19. बहुत सुंदर दी.....

    सुंदर रचना और सुंदर शीर्षक :-)

    उत्तर देंहटाएं
  20. दृढ़ हो मन की सारी बातें,
    दृढतर दिन हों, दृढ़तम रातें।

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  21. चलते रहने से मंजिल मिल ही जाती है ... जितना भी घुमावदार रास्ता क्यों न हो ...
    दृढ़ता का भाव लिए लाजवाब रचना ...

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  22. वाह . बहुत सुन्दर व् सार्थक प्रस्तुति
    कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |

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  23. मनमाने सुखों के लक्षागृह
    किसके हुए हैं
    निकलना होगा विजेता बनकर
    तब ही तो धुन के पक्‍के लोग
    इस मजबूती में ही जीते हैं

    सुन्दर व सार्थक प्रस्तुति

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  24. सच है! चलते रहना अपना काम है... निर्णय वक़्त ही करता है...

    ~सादर!!!

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  25. बिलकुल ठीक "जीवन चलने का काम चलते रही सुबह शाम"...तभी मंजिल मिल सकती है जैसे वो गीत है न "एक रास्ता है ज़िंदगी जो थम गए तो कुछ नहीं"...

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  26. जंग लगे ख्‍याल भी
    बड़ी ही फुर्ती से
    अपना नुकीला पन दर्शा देते हैं

    बहुत सुंदर ...अब दूसरी पुस्तक आ जानी चाहिए .....:))
    कहो तो किसी प्रकाशक से बात करूँ ......

    उत्तर देंहटाएं

  27. मनमाने सुखों के लक्षागृह
    किसके हुए हैं
    निकलना होगा विजेता बनकर
    तब ही तो धुन के पक्‍के लोग
    इस मजबूती में ही जीते हैं
    वर्ना उनके पास जीने की कोई वजह
    शेष रहती ही नहीं है --------

    अदभुत भाव
    उत्कृष्ट
    सादर

    उत्तर देंहटाएं
  28. वाह... उम्दा, बेहतरीन अभिव्यक्ति...बहुत बहुत बधाई...

    उत्तर देंहटाएं
  29. कर्तव्‍य की सीढि़याँ
    बड़ी ही ऊँची और घुमावदार होती हैं

    ...बहुत खूब।

    उत्तर देंहटाएं

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