बुधवार, 25 जनवरी 2012

एक सच इच्‍छाओं का ....


















यूँ ही सोचा एक दिन
ये इच्‍छाऍं कहां से आती हैं
इनका जन्‍मदाता कौन है
इस विचार के आते ही
मन ले गया अपनी ज़मीन पर
दिखाया उसने अनन्‍त इच्‍छाओं का बाग
जिसमें अनगिनत इच्‍छाएँ थीं
कोई जन्‍म ले रही थी
कोई किसी शाख को पकड़कर
लटक सी रही थी
कोई अधूरी सी मैं हैरान हो
मन से कहने लगी
ये सब
मन बोला मैं तो बस इन्‍हें जन्‍म देता हूं
इन्‍हें साकार तो विचार ही करते हैं
कर्म की प्रधानता भी
विचारों से आती है
मैं तो बस समय-समय पर
अनुचित इच्‍छाओं की
कांट-छांट करता रहता हूं
वर्ना विचार इसे पल्‍लवित व पोषित
कैसे कर सकेंगे
क्‍योंकि इन इच्‍छाओं की संख्‍या
मेरे हृदय की धड़कन के समान
जन्‍मती रहती है ...
मैं तो माध्‍यम हूं इन्‍हें
विचारों तक पहुंचाने का
विचार ही कर्म बनते हैं
हमारे कर्म ही हमारी प्रेरणा
मन की बातें
इच्‍छाओं का जन्‍म
विचारों का कर्म हो जाना
इसतरह मुझे एक सच इच्‍छाओं का
बतला गया मन ...

37 टिप्‍पणियां:

  1. विचारों से आती है
    मैं तो बस समय-समय पर
    अनुचित इच्‍छाओं की
    कांट-छांट करता रहता हूं ................

    उत्तम रचना...
    बधाई.

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  2. जिस तरह चिंतन एक विचार देते हैं , उसी तरह इच्छाओं का चक्रव्यूह होता है , एक भंवर ... जिसमें पड़ते ही अभिमन्यु सा हाल होता है

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  3. इच्छाओं के भीगे चाबुक चुपके चुपके सहता हूँ- ये कहना है गुलज़ार साहब का और आपने बताया कैसे जन्मती हैं इच्छाएं.. पूरी की पूरी कविता एक आध्यात्मिक यात्रा है!! शरीर से मन, मन से विचार, विचार से इच्छाएं और फिर अंतरात्मा की खोज!! बहुत खूब!!

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  4. utaam
    बुलबुले के संमान
    निरंतर उठती रहती हैं
    इच्छाएं
    जितना संतुष्ट रहे इन्सान
    उतना कम सताती इच्छाएं

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  5. वाह बहुत बढिया


    इच्छायों का ये माया जाल
    बन जाता जीवन में
    क्यूँ मकड़ी के जालो जैसा
    नशा बन ये छा जाता
    ख्याबो में .....

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  6. इच्छाओं पर विचार का पहरा ..गहन अभिव्यक्ति

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  7. कर्म ही प्रेरणा बनते अहिं इच्छाओं के पनपने का और उनके पोषण का ... और जैसे कर होते हैं इच्छाएं भी वही रूप ले लेती हैं ...

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  8. मन की बातें
    इच्‍छाओं का जन्‍म
    विचारों का कर्म हो जाना
    इसतरह मुझे एक सच इच्‍छाओं का
    बतला गया मन ..…………बेहद गहन और सटीक प्रस्तुति…………इच्छायें ही कर्म की जननी हैं।

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  9. sach kaha ichchaayen to humesha janm leti rahti hain usi se hum karm ke prati jaagruk hote hain.achchi abhivyakti.happy republic day.

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  10. इच्छायों का ये माया जाल
    बन जाता जीवन में
    क्यूँ मकड़ी के जालो जैसा
    नशा बन ये छा जाता
    ख्याबो में .....

    प्रभावी पंक्तियाँ ..

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  11. बहुत ही अच्छी.... जबरदस्त अभिवयक्ति.....वाह!

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  12. इच्छाओं का कोई अंत नहीं...हजारों ख्वाईशें ऐसी के हर ख्वाइश पे दम निकले... सुन्दर रचना

    नीरज

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  13. मन की बातें
    इच्‍छाओं का जन्‍म
    विचारों का कर्म हो जाना
    इसतरह मुझे एक सच इच्‍छाओं का
    बतला गया मन ...
    वाह बहूत ही बढ़िया गहन अभिव्यक्ति सदा जी बहुत खूब लिखा है आपने गणतन्त्र दिवस की हार्दिक शुभकामनायें

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  14. इच्छाओं का अंत नहीं। किंतु इच्छाओं का सम्मान भी करना चाहिए।

    एक चादर सांझ ने सारे नगर पर डाल दी,
    यह अंधेरे की सड़क उस भोर तक जाती है।

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  15. बहुत ही अच्छी, जबरदस्त अभिवयक्ति वाह!

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  16. बढिया रचना।
    सुंदर भाव।

    गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं....

    जय हिंद...वंदे मातरम्।

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  17. इच्छाओं का जन्म विचारों का कर्म हो जाता है।..सही है। इच्छाओं का सम्मान किया जाना चाहिए।

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  18. इच्छाओं का अंत नहीं उत्साह जगती सुन्दर रचना... गणतंत्र दिवस की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनायें...

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  19. मन और इच्छा के बीच का ये संघर्ष बहुत कुछ कहता है.

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  20. बहुत ही सूक्ष्म भावों से भरी अभिव्यक्ति! बहुत सराहनीय!गणतंत्र दिवस की हार्दिक बधाई!

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  21. हम ही स्वीकार या अस्वीकार करते हैं सब..

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  22. ये मन भी न जाने क्या-क्या करते और कराते रहता है..

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  23. आपकी किसी पोस्ट की चर्चा है नयी पुरानी हलचल पर कल शनिवार 28/1/2012 को। कृपया पधारें और अपने अनमोल विचार ज़रूर दें।

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  24. बहुत ही बढ़िया लिखा है आपने । सुन्दर अभिव्यक्ति ।
    बसंत पंचमी और माँ सरस्वती पूजा की हार्दिक शुभकामनाएँ । मेरे ब्लॉग "मेरी कविता" पर माँ शारदे को समर्पित 100वीं पोस्ट जरुर देखें ।

    "हे ज्ञान की देवी शारदे"

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  25. कभी तो मृगमरीचिका हैं ये इच्छाएँ तो कभी एक सपना जो इच्छा के रूप में जन्म तो लेता है किंतु फिर विचार और कर्म से होता हुआ अपना रूप अख्तियार कर ही लेता है! अति सुंदर सदा जी !

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