शनिवार, 31 दिसंबर 2011

मिल कर करें अभिनन्‍दन ...2012 का













मैं भविष्‍य से वर्तमान बन,
तुम्‍हारी दहलीज़ पे
आ गया हूं
मेरी कांधे पे एक झोली है
विश्‍वास की
उसमें 365 दिन हैं
उसका पहला दिन
जब निकलेगा
तब मेरा नाम लेकर
सूर्य की किरणें
तुम्‍हारा अभिनन्‍दन करेंगी
तारीखें बदलेंगी
दिन नये आते जाएंगे
सपने तुम्‍हारी आंखों में
झिलमिलाएंगे हर आह्वान तुम्‍हारा
पूर्ण होगा तुम्‍हें बस
संकल्‍पों के मंत्रों को उच्‍चारित करना होगा
अडिग रहना  होगा तुम्‍हें
क्‍योंकि मेरा समय
सुनिश्चित है आने और जाने का
मैं ठहरता तो कभी भी नहीं
भागता रहता हूं
घड़ी की टिक-टिक के साथ
तुम्‍हें भी अपने कदमों की रफ्तार को
कुछ गति देनी होगी
तो आओ स्‍वागत गीत जो
तुम्‍हारे होठ़ों पर है
उसे गुनगुनाओ कुछ इस तरह
कि चारों दिशाएं
तरंगित हो उठे ...
जिससे मन हर्षित हो जन-जन का
लेकिन उससे पहले
परिक्रमा का अंतिम फेरा करें पूरा
और मुस्‍कराती आंखों से कहें अलविदा 2011 को
चलो मिल कर करें अभिनन्‍दन  .... 2012 का

गुरुवार, 29 दिसंबर 2011

एक संवाद निरन्‍तर ....














तुम्‍हें सुकून मिलता होगा न
मौन से
खुद से खुद की कितनी ही बातें
कर लेना तुम्‍हारा
कभी मेरे शब्‍दों का मौन
ढूंढना तुम
वे तुम्‍हें पुकारते हुए मिलेंगे
तुम्‍हारे मेरे बीच यह मौन
यूं जैसे  ...
गंगा जमुना की धाराओं के नीचे
सरस बहाव लिए सरस्‍वती
सच कहूं तो
मौन रहना तुम्‍हारा और मेरा
होता ही नहीं सार्थक
एक संवाद निरन्‍तर चलता रहता है ..

............................

आश्‍चर्य कैसा ...
इस मौन के संवाद करने पर
क्षणांश गंभीरता का
आवरण डाल निकलती तुम
मेरी पुकार को अनसुना करने के लिए
जब मन तुम्‍हारा साथ नहीं देता तो
तुम कानों को बंद करती हथेलियों से
फिर भी तुम्‍हारा मौन
एक प्रश्‍नचिन्‍ह छोड़ जाता
तुम विचलित हो
खुद से बातें करने को
विवश हो जाती ...

सोमवार, 26 दिसंबर 2011

धड़कन है तभी तो ...!!!












धुंआ अकेला कहां होता है
उसके लिए आग का होना जरूरी है
फिर वह धुंआ
मन्दिर में जलते अगर का हो
या किसी यज्ञशाला में
होते हवन का ...
उसकी पहचान तो हो ही गई ...
लेकिन जिन्‍दगी का
धुंए सा होना
मुमकिन नहीं है
वह तो एक लक्ष्‍य लेकर चलती है
जिन्‍दगी का लक्ष्‍य मृत्‍यु है
लेकिन इस लक्ष्‍य की प्राप्ति होने तक
वह रूह से रूह का नाता
बड़ी ही बेबाकी से निभाती है
जैसे दिये में तेल भी है बाती भी है
लेकिन अग्नि का स्‍पर्श नहीं हुआ तो
कैसे कहेंगे ज्‍योति है ?... दीपक है ?
जब अग्नि है तभी तो धुंआ है
जिन्‍दगी है तभी तो मृत्‍यु है
धड़कन है तभी तो
रूह का होना भी सत्‍य है ...
वर्ना शरीर क्‍या है ?...एक पुतला
ज्‍यों माटी का खिलोना ... !!!


शुक्रवार, 23 दिसंबर 2011

खारे पानी में ....


















कभी देखना हो
वक्‍त का सितम,
मेरी खामोशी को देख लेना ...

म़रहम़  प्‍यार का
मेरे दर्द को
जाने क्‍यूं खारे पानी में
तब्‍दील कर देता है ...

उसका बड़प्‍पन है ये तो
जो मेरे गु़नाहों को भी
हक़ का ओह़दा देता है ...

आईना पढ़ लेता है
मेरी आंखों में तुमको
इसलिए जाने कब से
देखा नहीं उसे ...

रूठकर गए थे तुम
इक बार तो
ये सोचा होता
मुझको मनाना नहीं आता ....

मुहब्‍बत लफ़्ज
बे़मानी हो जाएगा
जो तुमने
मुझ पे ए़तबार न किया ....

बुधवार, 21 दिसंबर 2011

रूह आ़हत सी ... !!!













बेड़ियां पैरों में हों तो,
तकलीफ होती है
चलने में  ...
गर ख्‍़यालों में
लगानी पड़े जब बेड़ियां
जिंदगी मायूस हो जाती है
कै़द में रहकर
ग़ुनाह का अहसास मन को
कचोटता है ...
अपनी ही धड़कन के स्‍व़र
कुरेदते हैं जख्‍़मों को
आह होठों को छूकर धीमे से
सिसकी में बदलती है जब
रूह आ़हत सी 
जाने किस चाहत की
सज़ा पाती है
नज़र झुकाओ जब भी बस वो
सज़दे में दिखती है ...
दुआओं पे जब
हर इक लम्‍हा बसर होता है
ख़ुद पे अपनी ही
सांसो का क़हर होता है ...
सज़ा का तलबग़ार मन
तेरे सुकू़न की खा़तिर
हर जु़र्म का
इस्‍तेक़बाल करता है ...
ये कहते हुए ..
गर ख्‍़यालों में
लगानी पड़े जब बेड़ियां तो
जिंदगी मायूस हो जाती है
वहां हंसी खामोशी हो जाती है .....!!!

सोमवार, 19 दिसंबर 2011

कभी तुमसे ....!!!


















प्रेम ... कभी तुमसे
तुम्‍हारे दिल की कहता है
कभी तुम्‍हारे दिल की सुनता है
लेकिन तुमसे वो  नहीं कहता
जो तुम्‍हें पसन्‍द नहीं
वो तुमसे डरता है ...शायद
ये डर भी  इसे
इसी प्रेम ने दिया है
क्‍योंकि इसने तुम्‍हारी खुशियों के साथ
अपनी खुशियां देकर
सौदा कर लिया है मन ही मन
तुम जरा सा भी ना-खुश हो
वह बात इसे मंजूर नहीं होती
बस इसे यही डर सताता है
ये बात कहीं तुम्‍हें  नागवार गुजरी तो  ...
तुम्‍हारा दिल दुखी होगा
वो हंसता है तुम्‍हारी हंसी में
रोता है तुम्‍हारे अश्‍क बहने पे
बहते हुए अश्‍कों के बीच
कभी कर देता है चुपके से
प्रेम ये सवाल भी .... ?
बिखरता है दर्द जब
हद से ज्‍यादा
कुरेद के  ज़ख्‍मी हिस्‍से को
गहराई तक उतरकर
नमी को समेटकर
जाने कैसे अश्‍क बना देती हैं आंखे  ....
...............

शुक्रवार, 16 दिसंबर 2011

जिन्‍दगी कहां अंकगणित ....???

सम कुछ भी नहीं,
किसी के पास नहीं
सिवाय अंकों के खेल में
पर जिन्‍दगी
कहां अंकगणित होती है ....
बुद्धत्‍व का बोध कब होता है
जब हम अपने अंदर के
अशुद्ध विचारों को मार देते हैं
उसी पल हमारा नया जन्‍म होता है
खुद को मारने का अर्थ
उन स्थितियों को मारना
जो अहंकार को
बनाये रखती हैं
दृढ़ रहकर
उन हालातों को हटाना जो
हमें सत्‍य की राह से
विलग करते हैं ...
कभी सुख से सुख का सामना हो तो
ईर्ष्‍या हो उठती है
सामने वाले को आखिर वो
सुखी कैसे
मुझसे कम क्‍यूं नहीं
मेरी बराबरी पे
सच बहुत ही नागवार गुजरता है
सुख का सुख से मिलना
मानव मन में
समानता का भाव
कहीं ऊंच-नीच
कहीं वर्ण भेद
कहीं अमीरी-गरीबी तो है ही
लेकिन जब
दुख से दुख मिला तो
मन यहां भी
कसमसा उठता है
खुद को तसल्‍ली देने के लिए
ओह ... मैं अकेला नहीं
वो भी तो दुखी है
खुद को समझा लेता है
किसी तरह
ये मन है ही ऐसा
कुछ भी सम नहीं होने देता ...
किसी ने कहा है
इंसान मन से ही राजा मन से ही फ़कीर ...
भावनाएं ही आपको श्रेष्‍ठ बनाती हैं
फिर वह नज़र आपकी हो या
किसी और की ... !!!

सोमवार, 12 दिसंबर 2011

कभी झगड़ा तो कभी मुस्‍काना .... !!!

मुक्ति ... मुक्ति ... यह शोर
सुनकर मैंने इस पर
ध्‍यान केन्द्रित किया तो जाना
यह आवाज
मेरे ही अन्‍तर्मन का एक हिस्‍सा थी
शरीर के प्रत्‍येक अव्‍यवों ने
एक स्‍वर साध रखा था
हमें भी कुछ अपने मन की करने दो
बेसाख्‍़ता मैं हंस दी
तुम्‍हारा मन ... मेरी हंसी सुन
सब शांत हो गए मुंह लटक सा गया था
हां-हां तुम्‍हारा मन ...मुझे भी तो बताओ
कौन है ... तभी हथेली बोली
इन बाजुओं को तो देखो
कितना भार हमारे सहारे उठाते हैं
और सारा का सारा क्रेडिट खुद ले जाते हैं
तभी आंख ने  धीरे से कहा
सारे दृश्‍यों का अवलोकन मैं करती हूं
और इसका प्रतिफल मष्तिष्‍क ले उड़ता है
वो कहता है ये उसकी समझ है
तभी तुम सब चीजें पहचान पाते हो
तभी कान ने फड़ककर कहा
यदि मैं न सुनूं ना तो ... तुम सब का
पत्‍ता साफ हो जाएगा ...
कोई कुछ कहता इससे पहले ही
जिभ्‍या गरज़ सी पड़ी और मैं जो
बत्‍तीस दातों के बीच रहकर हर चीज का
रसास्‍वादन कराती हूं वह कुछ नहीं
मैंने तो अपना सर थाम लिया
अरे.. इनके मन में ये सब कब आ गया
मैने बारी-बारी सबको समझाया
एक दूसरे को
उनकी खूबियों से परिचित कराया
तुम सबका मन एक ही है
भले ही तुम्‍हारे कार्य अलग हैं
देखो उंगली को चोट लगती है तो
आंख रोती है न  ...
जब आंख रोती है तो
उंगली आंसू भी पोछती है न
देर रात जाकर कहीं यह निष्‍कर्ष आया
यही तो मन का काम है
एक दूसरे के दुख-सुख में काम आना
कभी झगड़ा तो कभी मुस्‍काना .... !!!

शुक्रवार, 9 दिसंबर 2011

सूना इनबॉक्‍स ...( )
















मैने समेटे हैं कई एहसास
इन दिनों
जब तुम्‍हें वक्‍त मिले तो बताना
उन्‍हें तुम्‍हारी नज़र कर दूंगी ...
उन पलों में सिर्फ तुम हो
मिलना हो जब खुद से
तो खबर करना
उन्‍हें भेज दूगी तुम तक
बिना कुछ कहे ...

मुझे कुछ कहना तो नहीं आता,
बस लिख लेती हूं यूं हीं कुछ
जब वक्‍त मिले तो बताना
उन्‍हें मेल कर दूंगी :)
पल भर भी
ये ख्‍याल मत लाना
जवाब देना होगा  क्‍या ?
ना ..घबराना मत
आदत हो गई है अब
सूना इनबॉक्‍स देखने की  ...( )

बुधवार, 7 दिसंबर 2011

सूखे रूमाल के बीच ....!!!

मुझे कुछ खरीददारी करनी है
कुछ की कीमत पता करनी है
सोचती हूं सबसे पहले
दोस्‍ती की कीमत का पता करूं
फिर उसके साथ
वफा का सौदा कर लूगी ...!
दूर है ठिकाना
अपनो का आओ
एक रिश्‍ता बना लेती हूं नया
उसके साथ चलूंगी
उसी तरह
जिस तरह वो चलेगा मेरे साथ
कोई शर्मिन्‍दगी नहीं होगी
आपस में सारी शर्तें
पहले ही तय कर लेंगे हम
वो मेरे बुरे वक्‍त में साथ होगा
तो मैं उसके बुरे वक्‍त में
दौड़ के पहुंच जाऊंगी उसके पास
खुशी के मौके पर
उसके बुलाने की प्रतीक्षा नहीं करूंगी फिर
लेकिन अभिमान को छोड़ना होगा
उसी दुकान पर तभी तो
मुस्‍कान के बदले हंसी दे सकूंगी
किसी बेगाने को
आंसुओ को सूखने के लिए
छोड़ दिया है जिद करके
सूखे रूमाल के बीच...!!
एक तह लगाकर रख लिया है
मुट्ठी में उसी तरह
जैसे मन को कड़ा करके
तोड़ता है गुलों को गुलशन से माली
देव प्रतिमा पे  चढ़ाने के लिए .... !!!

शनिवार, 3 दिसंबर 2011

वक्‍त की बात ...











तुम तक पहुंचने के लिए
मुझे बस
कुछ कदमों का
फासला तय करना था
लेकिन कभी
वक्‍त ने साथ नहीं दिया
कभी दिल न इजाजत नहीं दी ...
........................
मैने हालातों को
वक्‍त के हवाले कर दिया है
इसलिए जो है जैसा है
उसे वैसे ही रहने दो
हर घाव भर जाएगा
वक्‍त के मरहम से ....
........................
कठपुतलियों का खेल अब
गुजरे वक्‍त की बात हो गया
पर फिर भी लोग जाने क्‍यूं
कभी किसी के हाथ
सौंप देते हैं खुद को
या किसी को
बना लेते हैं अपने हाथों
की कठपुतली ....

गुरुवार, 1 दिसंबर 2011

द्वेश का बीज ....

मुझे बीज बहुत अच्‍छे लगते हैं,
बचपन में कभी
कोई बीज हांथ लगता तो
उसे घर के आंगन में
उत्‍साह के साथ बो देती थी
नियम से सींचना
और उसे अंकुरित होते
देखने की उत्‍सुकता  में
भोर में उठ जाना
मां मेरी उत्‍सुकता देख कहती
तुम्‍हें पता है ...
जैसे ये बीज हैं न
वैसे ही होते हैं  संस्‍कार के बीज
बस फर्क इतना होता है
उन्‍हें धरती पर नहीं
मन के आंगन में बोया जाता है
मैं हैरानी से  कहती ...मन का आंगन
मां बातों के प्रवाह में कहती
हां परोपकार... सदाचार ...कर्तव्‍य ... निष्‍ठा...
समर्पण ... सम्‍मान
त्‍याग और प्रेम
जो हमें मिलते हैं विरासत में
उनके बीज बचपन से ही तो
बोये जाते हैं
बस बेटा एक बीज
बहुत बुरा होता है और कड़वा भी
वो है द्वेष का 
जानती हो इसमें ईर्ष्‍या की खाद  व
अहित भाव का जल पड़ता है
इसे कभी भी पनपने मत देना
वर्ना यह द्वेश भाव कब 
प्रेम की जड़ों को खोखला कर देता है
कोई नहीं जानता
बड़े से बड़ा वृक्ष
धराशाई हो जाता है
और कितने घोसले उजड़ जाते हैं  ...!!!