बुधवार, 29 अप्रैल 2009

बंद करके मैंने जुगनुओं को . . .

अपना ही साया जब नजर नही आता आदमी को,
सोचता है वो तन्हाई के साये में कैसे जिया जाए ।

अंधेरे इस कदर मुझे तड़पा गए कि मैंने भी,
एक दिन ये ठाना अपने लिए कुछ किया जाए ।

मुठ्ठी में बंद करके मैंने जुगनुओं को सोचा,
कुछ देर ही सही मेरी तकदीर रौशन हो जाए ।

मेरी मुस्कान पल भर की देख बोले जुगनू भी,
होने वाली है अब तो सहर बोल क्या किया जाए ।

दिल्लगी पल दो पल के लिए "सदा" अच्छी है,
ताउम्र लगा के दिल ना किसी से जिया जाए ।

6 टिप्‍पणियां:

  1. कभी-कभी तन्हाई के साये भी भले लगते हैं...
    ~सादर!!!

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  2. क्या बात है वाह वाह वाह सदा जी।

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