गुरुवार, 30 अप्रैल 2009

बुलंद हैं इरादे . . .

हर कदम यूँ उठे की एक कदम
मेरी मंजिल और मेरे पास हो ।

डगमगाए जो कहीं मुश्किलों से कदम,
बुलंद हैं इरादे मन में ये अहसास हो ।

हर काम पहले आसां नहीं हुआ करता,
जीत होती है उसकी जिसे उसकी आस हो ।

सूरज सा जिसमे तेज, चाँद सी शीतलता हो,
साहस की डोर हाँथ में मन मैं विश्वास हो ।

कहते हैं "सदा" कुछ ख़ास करना है,
फिर क्यों डरूं जब विश्वास मेरे पास हो ।



5 टिप्‍पणियां:

  1. साकारात्मक सोच लिये एक सुन्दर रचना... लिखते रहिये

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  2. कल 25/11/2011को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  3. वाह ...बहुत बढ़िया और प्रेरणादायक रचना

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  4. जीत होती है उसकी जिसे उसकी आस हो ।

    वाह! क्या ही सार्थक रचना...
    सादर बधाई

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