शनिवार, 30 मार्च 2013

अडिगता से सफलता की ओर !!!!

कभी मन के खिलाफ़
चली है आँधी तुम्‍हारे शब्‍दों की
कभी नहीं चाहते हो जो लिखना वह भी
लिख डालती है कलम एक ही झटके में
वर्जनाओं के घेरे में करती परिक्रमा
शब्‍दों की तोड़ती है अहम् की सरहदों के पार
कुछ तिनके उड़कर दूर तलक़ जाते हैं
कुछ घोसलों में सजाये जाते हैं
कुछ कदमों तले रौंदे जाते हैं
...
एक ही विषय पर इस मन के
अलग-अलग से ख्‍यालों की दुनिया
हर बार घूमना, ठिठकना पल भर
कभी इस दिशा से उस दिशा तक जाना
समेटने को सार
चंचल, चपल हो जाना कभी अधीर
उसकी अधीरता ने कई बार
तोड़े हैं नियम जाने कितने ही
जिनकी माफ़ी नहीं होती थी कोई
उसके लिए भी वह अडिगता की धूनी रमा
एक अलख जगा लेता था हर बार
.....
अडिगता का सार
मन को पकड़ना इसकी चंचलता के परे
सफलता को नये सिरे से पकड़ना
सकारात्‍मकता की पहली सीढ़ी है
जो हमेशा ही जीवन में
एक नया दृष्टिकोण देता है
और विचारों को ओजस्विता मिलती है
अडिगता से सफलता की ओर !!!!

28 टिप्‍पणियां:

  1. अडिगता का सार
    मन को पकड़ना इसकी चंचलता के परे
    सफलता को नये सिरे से पकड़ना
    सकारात्‍मकता की पहली सीढ़ी है
    जो हमेशा ही जीवन में
    एक नया दृष्टिकोण देता है
    और विचारों को ओजस्विता मिलती है
    अडिगता से सफलता की ओर !!!!...bahut sundar sacchi baat

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  2. बहुत ही सुन्दर और सार्थक प्रस्तुति,आभार.

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  3. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (31-03-2013) के चर्चा मंच 1200 पर भी होगी. सूचनार्थ

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  4. चंचल मन को थामने की जरुरत है ...
    बेहद सटीक लिखा आपने ..

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  5. जिनकी माफ़ी नहीं होती थी कोई
    उसके लिए भी वह अडिगता की धूनी रमा
    एक अलख जगा लेता था हर बार
    बहुत सुन्दर अहसास लिए रचना...!!!!

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  6. अडिगता का सार
    मन को पकड़ना इसकी चंचलता के परे
    सफलता को नये सिरे से पकड़ना
    सकारात्‍मकता की पहली सीढ़ी है

    गहन और सार्थक रचना ....सदा जी ...!!

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  7. सफलता को नये सिरे से पकड़ना
    सकारात्‍मकता की पहली सीढ़ी है
    जो हमेशा ही जीवन में
    एक नया दृष्टिकोण देता है
    और विचारों को ओजस्विता मिलती है
    अडिगता से सफलता की ओर !!
    जिनसे जीवन सफल होता है,ऐसे गहन अर्थों को व्यक्त
    करती रचना
    सुंदर
    बधाई

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  8. मन को समझना मन के सहारे, कौन बताता है भला, अपने बारे में।

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  9. कभी नहीं चाहते हो जो लिखना वह भी
    लिख डालती है कलम एक ही झटके में
    वर्जनाओं के घेरे में करती परिक्रमा
    शब्‍दों की तोड़ती है अहम् की सरहदों के पार

    बहुत ही सुन्दर और सटीक रचना...

    सस्नेह
    अनु

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  10. सच अपने मन को टटोलने प्रयास तो करना ही होगा..... उम्दा रचना

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  11. वाह क्या बात कही आपने | बेहद सुन्दर और सार्थक रचना | आभार

    कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
    Tamasha-E-Zindagi
    Tamashaezindagi FB Page

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  12. मन को पकड़ना इसकी चंचल गति से परे ही अडिगता ...
    सार्थक रचना !

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  13. इस बार तो सहमत होना ही पड़ेगा। एकदम सच्ची बात लिखी है आपने।

    ...सुंदर रचना।

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  14. अडिगता का सार
    मन को पकड़ना इसकी चंचलता के परे
    सफलता को नये सिरे से पकड़ना
    सकारात्‍मकता की पहली सीढ़ी है

    ...बिल्कुल सच..बहुत सुन्दर और सार्थक रचना...

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  15. सुंदर रचना
    कभी कभी ऐसी रचना पढ़ने को मिलती है

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  16. अडिगता का सार
    मन को पकड़ना इसकी चंचलता के परे
    सफलता को नये सिरे से पकड़ना
    सकारात्‍मकता की पहली सीढ़ी है

    प्रेरणादायक सार्थक सन्देश देती कविता.

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  17. बहुत सुन्दर और सार्थक प्रस्तुति!!
    पधारें कैसे खेलूं तुम बिन होली पिया...

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  18. मन की चंचलता से परे अडिगता ही सकारात्मक दृष्टिकोण है !
    सार्थक प्रेरक सन्देश!

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  19. मानिसक धुंध और कुहांसे को ,सघन अनुभूतियों को शब्द दिए हैं आपने ,एक दृढता दी है संकल्पों को ,खूबसूरत रचना .आभार आपकी टिपण्णी का .

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  20. बहुत खूब..इस मन की चंचलता को वश में करना ही सफलता और प्रसन्नता की शुरुआत है।।।

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  21. जो इस सूत्र को समझ जाए वो सफल हो जाए..

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  22. अडिगता का सार
    मन को पकड़ना इसकी चंचलता के परे
    सफलता को नये सिरे से पकड़ना
    सकारात्‍मकता की पहली सीढ़ी है

    सटीक और सार्थक बात कही है ... सुंदर अभिव्यक्ति

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  23. एक ही विषय पर इस मन के
    अलग-अलग से ख्‍यालों की दुनिया
    हर बार घूमना, ठिठकना पल भर
    कभी इस दिशा से उस दिशा तक जाना
    समेटने को सार------
    जीवन का सच
    गहन अनुभूति
    उत्कृष्ट रचना

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