सोमवार, 11 जनवरी 2010

दर्द ...


दर्द आज

बयां करना चाहता था

अपनी पीड़ा को

जो उसे असहाय कर चली थी

जब से वह

उसके भीतर पली थी

चिंता के साथ

घुल रही थी उसकी हड्डियां भीं

उसके रोम छिद्र

सिहर उठते उसकी चुभन से

आंसुओ के वेग में

निशब्‍द मौन खड़ा वह

होठों को भींचकर

देखता उसकी जड़ता को

हठीली मुस्‍कान पपड़ाये हुये होठों पर

सफेद धारियों में

रक्‍त की लालिमा लाकर

उसे मन ही मन कुंठित करती

आज पूरे वेग से

वह झटकना चाहता था

गुजरना चाहता था हद के परे

हताशा और निराशा के

पकड़ना चाहता था

आस की एक नन्‍हीं किरण

जो इस दर्द का अंत कर सकती थी

23 टिप्‍पणियां:

  1. जिसकी पीर वही जाने और न जाने कोय..
    बढ़िया है... बेहतरीन है..

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  2. सच है दर्द जब हद से गुज़र जाता है तो उसको झटक कर उतार देना ही अच्छा होता है .......... अच्छी रचना है ........

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  3. आस की किरण को पकड़ना चाहता था....सकारात्मक सोच के साथ दर्द से लबरेज़ रचना.....खूबसूरत

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  4. दर्द झलक रहा है रचना से..सफल रचना...अपने को अभिव्यक्त करती.

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  5. दर्द को बहुत खूबसूरती से बयाँ किया है आपने....

    दिल को छू गई....


    (देरी से आने के लिए माफ़ी चाहता हूँ..... )

    Regards..

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  6. दर्द का बयान काबिले तारीफ है!
    सुन्दर रचना!

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  7. दर्द कभी खत्म नहीं होता सदा जी .....ये सिलसिला तो लगातार चलता रहता है ....हमें ही सीखना पड़ता है इनके साथ जीना ......!!

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  8. आपको और आपके परिवार को मकर संक्रांति की शुभकामनायें!
    बहुत ख़ूबसूरत रचना लिखा है आपने! दिल को छू गयी हर एक पंक्तियाँ!

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  9. पकड़ना चाहता था ...........
    खुद को बहलाने की एक और कोशिश
    बहुत अच्छी नज़्म

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  10. दर्द को बेहतरीन ढंग सी ब्यान किया आपने

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  11. पकड़ना चाहता था

    आस की एक नन्‍हीं किरण

    जो इस दर्द का अंत कर सकती थी
    Behad sundar hai pooree rachana !

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  12. मर्म स्पर्शी दिल को छू गयी रचना शुभकामनायें

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  13. आपको और आपके परिवार को वसंत पंचमी और सरस्वती पूजन की हार्दिक शुभकामनायें!

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  14. दर्द को बहुत खूबसूरती से बयाँ किया है आपने....

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  15. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज मंगलवार 10 अगस्त 2021 शाम 5.00 बजे साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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