सोमवार, 31 अगस्त 2009

चन्‍द लकीरों से ....

आड़ी तिरछी

टूटी फूटी रेखाओं में

हथेली की जब

भाग्‍य रेखा

कहीं बीच में ही

कटी होती है

यह घोषित करती है

उसका दुर्भाग्‍य

तब वह बदलना चाहता है

उन लकीरों का अर्थ

अपने कर्म से

कहीं

जीवन रेखा

नजर आती जब

दो टुकड़ों में विभाजित

तब वह जीना चाहता

हर पल को

आत्‍मविश्‍वास से

इसी तरह एक

दिन बदल लेता वह

अपनी पूरी तकदीर

चन्‍द लकीरों से

वह लड़कर

विजयी होता विश्‍वास

के साथ

9 टिप्‍पणियां:

  1. इसी तरह एक
    दिन बदल लेता वह
    अपनी पूरी तकदीर
    चन्‍द लकीरों से
    वह लड़कर
    विजयी होता विश्‍वास
    के साथ

    आत्मविश्वास बढ़ाती शानदार पंक्तियाँ कहीं हैं आपने .....!!

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  2. इसी तरह एक
    दिन बदल लेता वह
    अपनी पूरी तकदीर
    चन्‍द लकीरों से
    वह लड़कर
    विजयी होता विश्‍वास
    के साथ
    बहुत सार्गर्भित और सकारात्मक सोच को प्रेरोत करती रचना के लिये धन्यवाद और बधाई

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  3. सच है ..मुश्किल क्षणों में ही आत्मविश्वास अपनी पूर्णता पाता है ..!!

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  4. सकारात्मक सोच के लिये प्रेरित करती रचना.....सुन्दर भाव!

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  5. सच कहा ........... अगर हर कोई अपना haq mehnat से lenaa chaahe तो जीवन ही बदल जाए ............. lajawaab लिखा है

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  6. बदकिस्मती का आभास और हथेली की टूटी-फूटी लकीरों पर अमूनन ध्यान तभी जाता है जब जिंदगी में हर चीज़ उल्टा अर्थात जैसा चाह, वैसा न होकर उसका उल्टा होता है.
    ऐसे समय में ऐसे ही मज्बूत्र जज्बे काम देते हैं..........
    सुन्दर रचना.
    बधाई.

    चन्द्र मोहन गुप्त
    जयपुर
    www.cmgupta.blogspot.com

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