सोमवार, 10 अगस्त 2009

रूठ जाता अपने आप से वो . . .

जब भी वो उदास हो जाता है,

तुझे अपने और पास पाता है ।

तनहाईयों में तेरा अक्‍स जब,

दरो-दिवार में नजर आता है ।

रूठ जाता अपने आप से वो,

क्‍यों नहीं तुझे भूल पाता है ।

तेरी हर बात को दिल से लगा,

मसरूफ खुद को ही पाता है ।

सफर कठिन है मान भी लेता,

पर किसी से कह नहीं पाता है ।

7 टिप्‍पणियां:

  1. bahut hi sundar rachana ....jab kabhi udasi aati hai to tujhe apane aas pas pata hu .......atisundar

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  2. सुन्दर है आपकी अभिव्यक्ति ............ अक्सर उदासी में इंसान किसी अपने को ढूंढता है...

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  3. सफर कठिन है मान भी लेता,
    पर किसी से कह नहीं पाता है ।
    बहुत सुन्दर शेर कहे है आपने -- पढकर बहुत अच्छा लगा

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  4. रूठ जाता अपने आप से वो,

    क्‍यों नहीं तुझे भूल पाता है ।


    तेरी हर बात को दिल से लगा,

    मसरूफ खुद को ही पाता है ।


    aisa hi hota hai....... hum yaadon ko dil se laga ke khud ko hi masroof kar lete hain....... bhool nahi paate hain....

    prem ki gahri abhivyakti............

    Regards

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  5. सदा जी,

    इस अकेले अशआर ने पूरी बात कह दी:-

    रूठ जाता अपने आप से वो,
    क्‍यों नहीं तुझे भूल पाता है ।

    अच्छी रचना, बधाई।

    सादर,

    मुकेश कुमार तिवारी

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  6. आप सभी का बहुत-बहुत आभार, प्रोत्‍साहित करने के लिये ।

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  7. aapne jo kavita me vyakt kiya hai use hi prem kahate hai..
    bahut badhiya abhivyakti..
    kavita achchi lagi..aabhar..

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