शनिवार, 2 मई 2009

स्वर लहरी . . .


ऊँचे लंबे पर्वतों,

के बीच वो शांत,

निर्मल नदी जिसकी,

कलकल करती

स्वर लहरी, अक्सर

पर्वतों को विचलित करती,

ऊँचे लंबे . . . !

सोचते जबतब

हम यूँ जाने कब तक,

खड़े रहेंगे एक जगह,

काश, हम भी इस,

श्वेत सरिता से बहते,

बात अपने मन की,

किसी से कहते,

ऊँचे लंबे . . ।

उधर सोचती

धवल नदी,

मुझसे भले यह पर्वत हैं,

एक जगह खड़े तो हैं,

तनिक भी जीवन में

विश्राम नहीं

क्यों कर जीवन में,

पल भर भी

आराम नहीं . . !

ऊँचे लंबे . . . !



1 टिप्पणी: