शुक्रवार, 14 मार्च 2014

कुछ रंग उम्‍मीद की हथेलियों पर !!!!!














रंग आतिशी हो गए हैं सारे
गुलाल भंग के नशे में है
तभी तो हवाओं में
उड़ रहा है
चाहता है होली के दिन
ढोलक की थाप पर
हर चेहरा गुलाबी हो जाए !
..... 
सूखे हुये रंग
भीगना चाहते हैं
भीगते-भीगते
वो रंगना चाहते हैं
आत्‍मीयता का लिबास
होली की उमंग में !!
....
उमंग के इन्‍हीं लम्‍हों में
रंगों की जबान बस
स्‍नेह की बोली जानते हुए
कहाँ परहेज़ करती है
अपने और पराये का
तभी तो रंग जाता
तन के साथ मन !!!
...
कुछ रंग
उम्‍मीद की हथेलियों पर
घुल कर छाप छोड़ देते है
इन पलों में ताउम्र के लिए
फिर नहीं चढ़ता
कोई रंग दूजा
मन की दीवारों पर !!!!
.....

शनिवार, 8 मार्च 2014

कैसे डिग सकता है मेरा ‘मैं’ ????


‘मैं’ एक स्‍तंभ भावनाओं का
जिसमें भरा है
कूट-कूट कर जीवन का अनुभव
जर्रे- जर्रे में श्रम का पसीना
अविचल औ’ अडिग रहा
हर परीस्थिति में मेरा विश्‍वास
फिर भी परखता कोई
मेरे ही ‘मैं’ को कसौटियों पर जब
लगता  छल हो रहा है
मेरे ही ‘मैं’ के साथ !
....
तपस्‍वी नहीं था कोई मेरा ‘मैं’
पर फिर भी बुनियाद था
अपने ही आपका ‘मैं’
एक मान का दिया ‘मैं’
सम्‍मान की बाती संग
हर बार तम से लड़ता रहा
परछाईं मेरे ‘मैं’ की बनता जब उजाला
मिट जाता अँधकार जीवन का सारा !!
 .....
एक चट्टान था मेरा ‘मैं’
जिसको टुकड़ों में तब्‍दील करना
मुश्किल नहीं तो आसान भी नहीं था
हथेलियों में उभरेंगे छाले
ये सोचकर वार करना
मैं तूफानों के वार में था अडिग
जल की धार से पाया मेरे मैं ने संबल
सोचकर तुम बतलाओ

कैसे डिग सकता है मेरा ‘मैं’ ????