सोमवार, 28 नवंबर 2011

अपनी हथेली का ....!!!













बन्‍द पलकों में ख्‍वाबों की
सरगोशियां
आहटें उन कदमों की
जो दूर चले गए
पर दिल के बेहद करीब  थे
जिनके अहसास
उन्‍हें इंतजार रहता था
पलकों के बन्‍द होने का
वो मुझे थपकियां देते
या गुनगुनाते गीत
जिन्‍दगी के .....!
.......................................

सोचती हूं सारे शब्‍दों को
सौंप दूं तुम्‍हें
अपनी हथेली का
इसे विस्‍तृत आकाश देना
इनकी सोच को
धरती ने विस्‍तार दिया था
पर इन्‍हें हसरत थी
गगन में उड़ने की
मुझे तुम्‍हारी हथेलियों पर
एतबार ज्‍यादा है ...!!!!

शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

अभिलाषाओं का हवन ....!!!

बहुत दिनों बाद
आज जिन्‍दगी गले मिली
मैने मुस्‍करा के उसका
स्‍वागत किया ...
पर  ...
वो न मुस्‍काई न कुछ बात की
बस सिसकती रही
मैं आहत हो उठी
क्‍या हुआ ...
वो कातर स्‍वर में कहने लगी
कितना मुश्किल
हो गया है न यूं जीना
सबकी हसरतों का ख्‍याल रखना
सिवाय खुद की
तुम्‍हें पता है इन पलों में
कितना बिखर जाती हूं मैं
इच्‍छाओं की पूर्ति
इतनी आसान नहीं होती
जन्‍म से मृत्‍यु
तक की अवधि में
ये कितने सोपान पार करती है
लड़खड़ा के गिरती है कभी संभलती भी
तब भी इसकी
रूह को जन्‍म से संस्‍कारों की परिधि में
बांधकर अभिलाषाओं का हवन
करने के लिए आहुति देनी होती है
प्रेम की ... आस्‍था की ...विश्‍वास की
जिसकी जगह ले लेते हैं
आसानी से काम, क्रोध, मद, लोभ 
इनकी जकड़न से बच कहा पाता है कोई
रूप बदलते रहते हैं
हम कठपुतली की माफिंक
ताउम्र अपने अंतस की
आवाज को अनसुना करते हुए  ..
मन ही मन आहत होते रहते हैं ...
सच कह रही थी जिन्‍दगी
मैं इंकार न कर सकी
सच्‍चाई से उसकी ... ।

मंगलवार, 22 नवंबर 2011

ये जादू ....!!!

ये जादू क्‍या होता है ...?
यह सवाल मन में
जाने-अंजाने
एक लम्‍बी सी
परछाईं की तरह
आकर खड़ा हो जाता है
जिसका आकार
मेरे सवाल से इतना बड़ा होता
जिसके जवाब में
मैं बस खामोशी की
चादर तान लेती हूं ताकि
वो परछांई अदृश्‍य हो सके ...
हंसी जादू होती है क्‍या ?
या रूप जादू होता है
कहूं तो किसी की आवाज में
जादू होता है ... नहीं, ये सब तो आकर्षण है
फिर ....ये जादू क्‍या है ?
कोई परी जिसके हाथ में
होती जादू की छड़ी
हम उसके साथ हो लेते थे
अपनी ख्‍वाहिशों के साथ
लेकिन सच कहें तो
ये जादू .... .!!!
वास्‍तव में यह माया है
माया का
सीधा सा अर्थ है भ्रम
जिसमें हम ताउम्र जीते रहते हैं
ये किसी भी वस्‍तु या विशेष के लिए
हो सकता है  या फिर जो
अद्भुत कला-कौशल का ज्ञाता हो
तब भी यही अहसास
उठता है जरूर यही जादू है ....
जब छोटे थे तो भी यह सवाल रहता था
मन में हमेशा
कोई शैतानी कर लेते जब
उसकी खबर मां को होती तो
लगता इन्‍हें कैसे पता चला
तब लगता था
जरूर मां को जादू का पता है
सच आज भी कई बातें
जब बिन बताए मां
जान जाती हैं
तो यही लगता है
सबसे बड़ा जादू तो यही हैं....
जिन्‍हें हमारी
हर आहट की खबर होती है ...
बिना कहे ...!

शनिवार, 19 नवंबर 2011

इस बंदगी के लिए ....!!!

हमने ही जाने-अंजाने
जमीं तैयार की थी,
मुहब्‍बत की
तुमने कहा था न
जब प्यार की बातें होती हैं
वहाँ मेरा साया होता ही है .
बस उसी क्षण
मैने तुम्‍हारे यह शब्‍द
चुरा लिये थे
हो सकता है तुम
मेरी इस चोरी के लिए
नाराज हो जाओ मुझसे
या फिर
खामोशी की चादर
ओढ़ लो ...
लेकिन जितना जाना है तुम्‍हें
उससे यह कह सकती हूं
बस थोड़ी देर की खामोशी होगी
फिर होगा तुम्‍हारा
वही प्‍यार
जिसमें हम खामोश रहकर
भी बात कर लिया करते हैं
तुम्‍हें पता है
बिना तुमसे कुछ कहे
मैं लौट आई
उन अहसासों को
अपने दामन में समेटकर
लेकिन इन शब्‍दों को
मैं पल-पल
जीती रही जिन्‍दगी की तरह
कभी करती हूं
बन्‍दगी तुम्‍हारी
कभी तुम्‍हें जी लेती हूं
मन ही मन
सुना है
रिश्‍ते तो ऊपर वाला बनाता है
चाहे वह कोई भी रिश्‍ता हो
उसका नाम हो
या फिर
वह बेनाम ही क्‍यूं न हो
चाहत
जिन्‍दगी की बंदगी करना सिखा देती है
यह तो सुना होगा तुमने भी
मुझे इजाज़त दे दो
इस बंदगी के लिए
एक मुस्‍कान के साथ .... :)

बुधवार, 16 नवंबर 2011

वज़ह मिल जाएगी जीने की .... !!!

दर्द का मौसम
आंसुओं की बारिश
तमन्‍नाएं फिर भी हंसने की
अभी बाकी हैं
हंसते हुए कभी
आंख भर आए तो
चेहरे को छिपाना मत
वर्ना जिंदादिली का तुम्‍हारी
चर्चा आम हो जाएगा
कहने वाले ने क्‍या खूब कहा है ...
बिना लिबास आए थे इस जहान में
बस इक कफ़न की ख़ातिर इतना सफर करना पड़ा
जब जीने की कोई वज़ह न हो
तो जिन्‍दगी में
पन्‍नों से बढ़कर हमसफ़र कोई नहीं होता
तुम्‍हारे हर अश्‍क को
ये अपने सीने में ज़ज्‍ब कर लेता है
और किसी के आगे
अपने लब कभी नहीं खोलता
तुम्‍हारी मायूसियों में
खोजता है
तुमने क्‍या नहीं पाया है
तुम्‍हारी कमियां
तुम्‍हें कभी नहीं गिनाता
नहीं कहता
तुमने क्‍या दिया है उसे
वह तो बस बांटना जानता है तुम्‍हारा
अवसाद तुम्‍हारा दर्द
तुम्‍हारी खुशी में ...
बिन पंखों के उड़ता है ये
फिर भी तुम मायूस हो जिन्‍दगी से
इससे शिक़वा कैसा ...
हौसला है तुम्‍हारे पास
तभी तो जिन्‍दगी को जीने का असली मज़ा है
तूफ़ानो से लड़कर देखो
साहिल पे पहुंचने का उत्‍साह
दुगना होगा ...
कोई तुम्‍हारा नहीं हो सका
इस बात की परवाह मत करो
अपने जैसे किसी
बेगाने की जिन्‍दगी को कुछ सांसे दे दो
तुम्‍हारी जिन्‍दगी को
वज़ह मिल जाएगी जीने की .... !!!

सोमवार, 14 नवंबर 2011

हंसी को आजाद करते हैं .... !!!

  तुम्‍हारे और मेरे बीच
यह खामोशी क्‍यूं
आपस में हमारी कोई
ऐसी बात भी
नहीं हुई
जो तुम्‍हें और मुझे
बुरी लगी हो ...
फिर यह
पहल करने का
अहम बेवजह ही पाल लिया था
मन ने
कौन समझाएगा
अब मन को
छोटी-छोटी बातें
बेमतलब की करके
हंस लिया करते थे
वो हंसी बेकरार है
मेरे तुम्‍हारे अहम के पीछे
तुम गुमसुम हो
तुम्‍हारा चेहरा देख कर
मैं भी खामोश हूं
ऐसा करते हैं भूल जाते हैं
अहम को
हंसी को आजाद करते हैं
आओ कुछ कहने की
शुरूआत करते हैं ....
तुम्‍हें पता है
मैने कहीं पढ़ा था
उंगलियों के मध्‍य
ये रिक्‍त स्‍थान
क्‍यूं रहता है ?
वो इसलिए की
जब हम एक दूसरे का
हांथ थामें तो
उसमें मजबूती कायम रहे :)
बस यही मुस्‍कान
तुम्‍हारे चेहरे पे
भली लगती है
कैद होकर हंसी भी
सच मानो
बिल्‍कुल नमक की डली लगती है .... !!!

शुक्रवार, 11 नवंबर 2011

ढलता हुआ सूरज नहीं देखा ... !!!














खोजते थे तुम पल कोई ऐसा
जिसमें छिपी हो
कोई खुशी मेरे लिए
मैं हंसती जब भी खिलखिलाकर
तुम्‍हारे लबों पर
ये अल्‍फ़ाज होते थे
जिन्‍दगी को जी रहा हूं मैं
ठिठकती ढलते सूरज को देखकर जब भी
तो कहते तुम
रूको एक तस्‍वीर लेने दो
मैं कहती
कभी उगते हुए सूरज के साथ  भी
देख लिया करो मुझे
चिडि़यों की चहचहाहट 
मधुरता साथ लाती है
तुम झेंपकर
बात का रूख बदल देते थे
कुछ देर ठहरते हैं
बस चांद को आने दो छत पे
जानते हो
वो मंजर सारे अब भी
वैसे हैं
मेरी खुशियों को किसी की
नजर लग गई है
मैने बरसों से 
ढलता हुआ सूरज नहीं देखा ... !!!

मंगलवार, 8 नवंबर 2011

कैसे न करूं मैं परिक्रमा आपकी .....!!!

















मां ...आप
हर बात मन में कैसे
जज्‍ब सी कर लेती हैं
देखिए ना मेरा स्‍नेह
आपको धूरी बना
बस आपकी ही
परिक्रमा करता रहता है
कुछ पूछने पर
आंखो में उसके
नजर आती है
आपकी तस्‍वीर
ये कैसी है तलाश इसकी
जो कभी खत्‍म
नहीं होती ....।
मां ..आप
हर बात को इतनी सहजता से
कैसे ले लेती हैं
जब हम नाराज होते हैं तो
आप झांककर हमारी आंखों में
मुस्‍करा के कहती हैं
तुम्‍हारा चेहरा
बिल्‍कुल अच्‍छा नहीं लगता ऐसे
बताओ तो मुझे क्‍या हुआ
और हम शुरू हो जाते हैं
टेप रिकार्ड का प्‍ले बटन दबा दिया हो
किसी ने जैसे
शिकायतें और शिकायतें
और उस वक्‍त
हम ध्‍यान देते तो देखते
आपका हांथ हमारे सिर पर होता
बस इतनी सी बात
हां मां बात इतनी सी है
इसका अहसास हुआ हमें
आपकी मुस्‍कराहट में
उस धवल हंसी  से
जाना कितना सुकून है
आपके साये में
तो कहिए
कैसे न करूं मैं परिक्रमा आपकी  .....!!!

गुरुवार, 3 नवंबर 2011

तुमसे कहा क्‍यूं नहीं .... :)


















मुझे कहना होता है जब भी
तुमसे कुछ
उलझनें तुम्‍हारी मुझे
कुछ कहनें नहीं देती
मैं खामोश रह
सोचती रहती हूं बस
तुमको और तुम्‍हारी उलझनों को
मुझे हंसना भी
तुम्‍हारे साथ होता है
बतियाना भी
तुम्‍हारे साथ होता है
खबर है यह  भी  कि
तुम्‍हारी दुनिया बहुत बड़ी है
मेरी दुनिया सिर्फ
तुम से जुड़ी है .....
कहो कैसे संभव है
मेरे लिए कुछ लम्‍हे
चुराने हों तुम्‍हें भरी भीड़ से
मुमकिन है क्‍या ?
ये शिकायत तो नहीं है
बस मन में उठा
इक ख्‍़याल है  ....
कहना जरूरी था
तुम ये न कहो कभी
तुमसे कहा क्‍यूं नहीं .... :)

मंगलवार, 1 नवंबर 2011

मेरी खुशी ....!!!


 










उसे जानना है मेरे बारे में सब कुछ,
मैं हंस दी
उसके इस सवाल पे
सब कुछ क्‍या होता है
उसने कहा ...
आपकी चाहत, खुशी और हंसी ,
आपकी पसंद
मैं सोच में पड़ गई
क्‍या कहती
इन बातों से तो मैं खुद भी अंजान थी
मेरी चाहत ...
मन ही मन सोचा
अपने बारे में कभी सोचा ही नहीं मैने
तो उसे क्‍या बताऊं ...
मेरी खुशी ..
दूसरों के चेहरे पर 
मुस्‍कान के सिवा 
कभी कुछ चाहा ही नहीं
मैं उन्‍हीं खुशियों के बीच
रही हंसती सदा
मेरी पसंद भी ऐसी ही है
जो सबको भा जाए
वही मुझे पसंद है ...
उसने अपनी पलकें
हैरानी से झपकाईं
ऐसा भी कहीं होता है
मैने एक लम्‍बी सांस ली
ऐसा होता तो नहीं
पर शायद मेरे साथ ऐसा हो गया है ...!!!!

ब्लॉग आर्काइव

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मन को छू लें वो शब्‍द अच्‍छे लगते हैं, उन शब्‍दों के भाव जोड़ देते हैं अंजान होने के बाद भी एक दूसरे को सदा के लिए .....