शुक्रवार, 28 अक्तूबर 2011

मन की बातें ...!!!













मेरे सवालों के दायरे में
जब वो होती है तो
उसका मन भी मेरी बातों  में
उलझने लगता है
वह मुझे बहलाकर झट से
बाहर हो जाती है
मुझे पता है उसका दिल  भी
मेरी तरह मासूम है
मां है वह तो क्‍या हुआ
कल वो बहू थी किसी के घर  की
उससे पहले बेटी थी किसी के आंगन की
जहां जन्‍म लिया था उसने
पर सदा ही पराये घर जाने की  बातें
सुन-सुनकर बड़ी हुई
दिल तो ताउम्र
एक बच्‍चा रहता है
एक यही है
जो हमेशा सच्‍चा रहता है
हां बढ़ती उम्र के साथ
उसे डालना पड़ता है
चेहरे पर गंभीरता का आवरण
लोग क्‍या कहेंगे
इसी सोच के साथ मन के
हर बेतक्‍कलुफ होते ख्‍याल को
झटकना होता है परे
हंसने मुस्‍कराने से पहले
दिल ही दिल उसकी सहमति से
आम होना पड़ता है
खास बनने के लिए
सोचती हूं कई बार
हम क्‍यूं लोगों के लिए
कभी-कभी न चाहते हुए भी
अपने मन की नहीं कर पाते
बस इसी सोच में उलझ जाते हैं
कि लोग क्‍या कहेंगे ...
कभी बच्‍चों के बड़े होने की दुहाई तो
कभी परिवार वालों की सोच ने
मन की मन में ही रहने दी
सोचती हूं आज
मेरी ये बातें किसी को
गलत तो लगेंगी
पर शायद उन्‍हें सही लगें
जिनके मन की मन में रह गई
बस उन्‍हीं के लिए हैं
ये मन की बातें ...!!!

सोमवार, 24 अक्तूबर 2011

मैं जलाऊं दीप संग दीप ...












मैं जलाऊं दीप संग दीप
तुम उनमें उम्‍मीद का
तेल डालना कुछ ऐसे कि
वो देर रात तक
जलते रहें
मां लक्ष्‍मी के आगमन तक
विश्‍वास की बाती
जब जलेगी तो
उस प्रकाश से अलौकिक होगी
हर घर की दहलीज
तब अंधकार दूर छिटक जाएगा
सूनी गलियां रौशन होंगी
जहां दीवारो पे होंगी
जगमगाती झालरें खुशियों से
दमकेंगे चेहरे हर हांथ में होगा कुछ  मीठा
लबों पे सबके होगा संदेश
दीपावली की शुभकामनाओं का
यह पल होगा प्‍यारा
हम सबकी भावनाओं का ....!!!!

गुरुवार, 20 अक्तूबर 2011

कोई अवशेष रह न जाए ...











मैं
दूर जाना चाहती हूं,
तुम्‍हारी हर याद से
हर याद को मैने
बहते जल में
प्रवाहित किया
आते समय अपने पैरों को धोया
अपने उन्‍हीं हांथो से छूकर
कोई अवशेष रह न जाए बाकी
आंसुओ से भीगे चेहरे को
पोछा आंचल से अपने
कम्पित अधरो ने जो कहा
उसे अनसुना कर
मैं थके कदमों से लौट पड़ी
पता है तुम्‍हें
यह हिचकियां
मेरा पीछा नहीं छोड़ रहीं
अब भी लगता है इन्‍हें
तुमसे दूर नहीं जा सकूंगी
पर बताना होगा मुझे
घर की उस दहलीज़ को
जिसे लांघती आई हूं
हरदम साथ तुम्‍हारे
उन दीवारों को
जो राज़दार थीं हर बात की
उन्‍हें भी आदत डालनी होगी
तुम्‍हारे बिना रहने की ....
मैं दूर जाना चाहती हूं .......!!!

सोमवार, 17 अक्तूबर 2011

संभावनाओं के द्वार ....!!!
















संभावनाओं के द्वार
तुम खटखटाओ
तो सही
मुश्किलें बहुत हैं
दूर है मंजिल ....मगर कितनी ?
तुम पाने को उन्हें
हांथ अपना ब़ढ़ाओ तो सही
हार क्यूं मानना
जो विजयी हुए हैं
उनकी पराजय को तुमने कभी
नंगी आंखों से देखा नहीं
जब भी देखा बस यही सोच रखकर
वह कितना वैभवशाली है
कितना सम्पन् है
कितना सुख !! ... आह यह ईर्ष्या क्यूं ??
पूछते जो जानते कितनी रातों का जगा है वो
कितने दिनों की भूख ने उसे आज
इस जीत का सम्मान दिया है...
सच तो यही है ...
जिसे हर कोई नहीं जानता
सच का सामना करना पड़ता है
अदम् साहस से
उसी तरह तुम
पराजय का सामना करो
विजय तुम्हारी होगी
बस शंखनाद करना होगा
अपने मन के उन विचारों को
रौंदना होगा अपने कदमों के तले
मन की इन्द्रियों को थामना होगा
अपनी उन्हीं हथेलियो से
जिसकी तर्जनी से
पोछते आए हो आंसू अपने तुम
ये अबोध मुस्कान कैसी
तुम्हारे लबों पर
मेरी बातें तुम्हें दुश्कर लग रही हैं शायद
नादान हो तुम ...
दुश्कर क्या होता है ?
मन के हारे हार है मन के जीते जीत
सुना होगा तुमने भी
आओ उठो .. आगे बढ़ो ... वक् बढ़ रहा है
अपनी द्रुत गति से
तुम्हें इसके हर पल को पकड़ना है
पहचान करनी है इन पलों से
तभी तुम लिख पाओगे
एक नई इबारत
जिसे पढ़ने के लिए
तुम्हारे अपने भी होंगे कतार में
बस हौसला रखना
दुनिया तुम्हारे कदमों में होगी
विजय की पताका
तुम्हारे हांथों में ....!!!

शुक्रवार, 14 अक्तूबर 2011

रूह ने आवाज दी है ....










आज रूह ने आवाज दी है
बुलन्‍द हौसलों को
वे हौसले जो हार कर भी
नहीं हारते थे कभी
थककर भी नहीं थकते थे कभी,
हां शिथिल जरूर हो जाते थे
स्‍नायुतंत्र कमजोर हो जाता था
जीजिविषा उनमें एक
ऐसा संचार करती कि वह
भूल जाता सब कुछ
तब कुछ लोग कहते थे
उम्र का तकाजा होता है ये
मैने नहीं माना कभी भी इसे
भूल जाने का अर्थ
यह नहीं होता कभी भी
वह बात दिमाग से गई तो
दिल से भी गई
नहीं वह दिमाग से निकलकर
दिल में अपनी जगह बना लेती है
और दिल उसे तरंगित करता है
अपनी धड़कनों के साथ .....
एक सच सुनने के लिए
सच को कहना सच को मनन करना
बहुत जरूरी होता है
तभी वह एक आवाज बनता है
जो टकरा सकता है
हर तूफान से जिसमें होती है
वह शक्ति
जो दस्‍तक देती है हर दरवाजे पर
जहां सोई हुई रूहें जाग जाती हैं
और हौसले बुलन्‍द हो
एक आवाज बनते हैं ..... !!!

शुक्रवार, 7 अक्तूबर 2011

चेहरे पर मुखौटा ....









उतार
फेको अपने चेहरे से
ये मुस्‍कराहट झूठी
ये खिलखलाती हंसी
भ्रमजाल सा बुन दिया है तुमने
मेरे चारों ओर
हर तरफ भीड़ है बस शोर है
हर चेहरे पर मुखौटा है
मन में कुछ चेहरे पर कुछ
कैसी दिनचर्या हो गई है
अपना क्रोध भी छुपाना पड़ता है
पलकों में थमें आंसू रहते हैं
लबों पे दर्द छटपटाता है
फिर क्‍यूं ...
मुस्‍कराहट में
दर्द को दबाना पड़ता है
दवाईयों की एक नियमित डोज से
चूक हो गई तो
फिर असहनीय पीड़ा
तब यह खिलखिलाहट
तुम्‍हारी जिंदादिली सब बेमानी हो जाएंगे
दर्द की दवा नहीं की तो ....
जो तुमसे प्‍यार करते हैं
तुम्‍हें कभी उनकी परवाह नहीं होती क्‍यूं ?
शायद उनकी तरफ से तुम
निश्चिन्‍त होते हो
जो तुमसे प्‍यार नहीं करते
तुम उन्‍हें ही सहेजने के फेर में
दिन रात एक कर देते हो
भूल जाते हो
कोई तुम्‍हारा अपना
आहत हो गया होगा
तुम्‍हारे इस व्‍यवहार से
चेहरे पर मुखौटा मत लगाओ हर वक्‍त
कभी तो अपने चेहरे पर
आने दो सच्‍चे प्‍यार की आभा
खुशी से चहकती आवाज
जिसमें तुम्‍हारा अस्तित्‍व नजर आए
तुम्‍हें भी और दूसरों को भी .... !!!

शनिवार, 1 अक्तूबर 2011

स्‍नेह को समर्पित ....












प्रेम
सदा ही मधुर होता है,
चाहे लिया जाये या दिया जाये
जहां भी होता है यह
वहां विश्‍वास स्‍वयं उपजता है
किसी के कहने या करने
की जरूरत ही नहीं पड़ती
इसके लिए
प्रेम निस्‍वार्थ भाव
कब ले आता है मन में
कब समर्पण जाग जाता है
कब आस्‍था
आत्‍मा में जागृत हो उठती है
और एक ऊर्जा का संचार करती है
तरंगित धमनियां स्‍नेहमय हो
हर आडम्‍बर से परे
सिर्फ स्‍नेह की छाया तले
अपने जीवन को सौंप
अनेकोनेक सोपान पार कर जाती है
बिना थकान का अनुभव किये
मन हर्षित होता है
जीवन में सिर्फ उल्‍लास होता है
रंजो-गम से दूर
उसे सिर्फ एक ही अक्‍स नजर आता है
स्‍नेह का जिसे जितना बांटो
उतना ही बढ़ता है
अमर बेल की तरह .....
जब काम मरता है तब
प्रेम जागृत होता है
जब लोभ मरता है तो
वैराग्‍य का जन्‍म होता है
जब क्रोध का नष्‍ट होता है
तो क्षमा अस्तित्‍व में आती है
और क्षमा के साथ हम
फिर स्‍नेह को समर्पित हो जाते हैं ....!!!

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मन को छू लें वो शब्‍द अच्‍छे लगते हैं, उन शब्‍दों के भाव जोड़ देते हैं अंजान होने के बाद भी एक दूसरे को सदा के लिए .....